उच्च-अल्कोहल युक्त औषधीय निर्माणों के विनियमन हेतु केन्द्र द्वारा औषधि नियमों में संशोधन

पाठ्यक्रम: जीएस-2/स्वास्थ्य

सन्दर्भ

  • केन्द्र सरकार ने उच्च-अल्कोहल युक्त औषधीय निर्माणों (High Alcohol-Containing Drug Formulations) के विनियमन को सुदृढ़ करने के लिए औषधि नियम, 1945 में संशोधन किया है।

भारत में औषधियों का विनियमन

  • केन्द्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO), जिसके प्रमुख भारत के औषधि महानियंत्रक (Drugs Controller General of India) होते हैं, औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 तथा उसके अंतर्गत बनाए गए नियमों के अनुसार देश में विपणन की जाने वाली औषधियों की गुणवत्ता का विनियमन करने वाली केन्द्रीय प्राधिकरण है।

देश में औषधियों, प्रसाधन सामग्री तथा चिकित्सीय उपकरणों के आयात, निर्माण, वितरण और बिक्री का विनियमन निम्नलिखित प्रावधानों के अंतर्गत किया जाता है—

  • औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940
  • औषधि नियम, 1945
  • चिकित्सीय उपकरण नियम, 2017
  • नवीन औषधि एवं नैदानिक परीक्षण नियम, 2019
  • प्रसाधन सामग्री नियम, 2020

राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA)

  • एनपीपीए को औषधि (मूल्य नियंत्रण) आदेश, 2013 (DPCO) के अंतर्गत औषधियों के मूल्य निर्धारित एवं संशोधित करने, अनुपालन की निगरानी करने, आवश्यक औषधियों की उपलब्धता सुनिश्चित करने तथा औषधि नीति पर परामर्श देने का दायित्व सौंपा गया है।

भारतीय फार्माकोपिया आयोग (IPC):

  • यह भारतीय फार्माकोपिया के नियमित प्रकाशन का दायित्व निभाता है, जो औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 के अंतर्गत औषधियों के मानकों का आधिकारिक संकलन है।
  • फार्माकोपिया भारत में विपणन की जाने वाली औषधियों की पहचान, शुद्धता तथा शक्ति के मानक निर्धारित करता है।
  • औषधियों के निर्माण, बिक्री एवं वितरण पर नियामक नियंत्रण राज्य सरकारों द्वारा नियुक्त राज्य लाइसेंसिंग प्राधिकरणों (SLAs) के माध्यम से लाइसेंसिंग एवं निरीक्षण प्रणाली द्वारा किया जाता है, जबकि आयातित औषधियों का नियमन केन्द्र सरकार द्वारा CDSCO के माध्यम से किया जाता है।

राज्य स्वास्थ्य नियामक उत्कृष्टता सूचकांक (SHRESTH):

  • यह एक अभिनव राष्ट्रीय पहल है, जिसका उद्देश्य पारदर्शी एवं आँकड़ा-आधारित ढाँचे के माध्यम से राज्यों की औषधि नियामक प्रणालियों का मूल्यांकन एवं सुदृढ़ीकरण करना है।

नवीनतम विकास 

  • स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने एथिल अल्कोहल युक्त औषधीय निर्माणों को अनुसूची K के अंतर्गत प्राप्त लाइसेंस संबंधी छूट समाप्त कर दी है।
  • अब 12% (वॉल्यूम/वॉल्यूम) से अधिक एथिल अल्कोहल तथा 30 मिलीलीटर से अधिक मात्रा वाले सभी औषधीय निर्माणों को अनुसूची K के अंतर्गत मिलने वाली छूट प्राप्त नहीं होगी।
  • ऐसे उत्पादों के लिए अब औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 के अंतर्गत आवश्यक लाइसेंस प्राप्त करना अनिवार्य होगा।

महत्त्व:

  • इस संशोधन से अल्कोहल युक्त औषधीय उत्पादों पर नियामकीय निगरानी सुदृढ़ होगी तथा उनकी आपूर्ति केवल विनियमित औषधि आपूर्ति श्रृंखला के माध्यम से सुनिश्चित की जा सकेगी।

औषधि नियम, 1945 की अनुसूची K 

  • अनुसूची K में उन कुछ औषधियों की सूची दी गई है, जिन्हें निर्धारित शर्तों के अधीन औषधि नियम, 1945 के कुछ प्रावधानों से छूट प्राप्त है।
  • इसका उद्देश्य उन औषधियों की बिक्री एवं वितरण को सुगम बनाना है, जिनके लिए कठोर लाइसेंसिंग आवश्यकताओं की आवश्यकता नहीं होती।

कड़े विनियमन की आवश्यकता एवं उद्देश्य

दुरुपयोग एवं अवैध उपयोग की रोकथाम:

  • जुलाई 2026 के संशोधन से पहले एथिल अल्कोहल युक्त कुछ औषधीय तैयारियों का नशीले पदार्थों के विकल्प के रूप में दुरुपयोग किया जा रहा था, जिस पर विभिन्न राज्य सरकारों ने तत्काल हस्तक्षेप की आवश्यकता जताई थी।

जनस्वास्थ्य एवं उपभोक्ता सुरक्षा:

  • औषधीय निर्माणों में प्रभावी चिकित्सीय क्षमता होनी चाहिए।
  • निम्न गुणवत्ता वाली अथवा नकली औषधियाँ उपचार की विफलता तथा औषधि-जनित घातक विषाक्तता का कारण बन सकती हैं।

प्रतिजैविक प्रतिरोध (AMR) से मुकाबला:

  • बिना नियंत्रण के ओवर-द-काउंटर (OTC) शक्तिशाली प्रतिजैविकों की बिक्री वैश्विक स्तर पर प्रतिजैविक प्रतिरोध की समस्या को बढ़ाती है।

निर्यात प्रतिष्ठा बनाए रखना:

  • जेनेरिक औषधियों के प्रमुख वैश्विक आपूर्तिकर्ता होने के कारण USFDA जैसी अंतरराष्ट्रीय नियामक संस्थाओं के निरीक्षणों में सफल होने हेतु कड़े अनुपालन की आवश्यकता है।

 वर्तमान प्रणाली से जुड़ी समस्याएँ

निर्माण गुणवत्ता संबंधी चिंताएँ:

  • संदूषण एवं गुणवत्ता संबंधी त्रुटियों की घटनाएँ विनिर्माण मानकों के पालन में कमियों को उजागर करती हैं।

खंडित नियामक व्यवस्था:

  • अनेक नियामक प्राधिकरणों तथा अलग-अलग प्रवर्तन मानकों के कारण निगरानी में असंगति उत्पन्न होती है।

ओवर-द-काउंटर औषधि संस्कृति:

  • व्यापक स्व-औषधि सेवन (Self-medication) औषधियों के अविवेकपूर्ण एवं असुरक्षित उपयोग का जोखिम बढ़ाता है।

नियामकीय क्षमता की कमी:

  • भारत में औषधि विनियमन केन्द्र एवं राज्यों की साझा जिम्मेदारी है। अनेक राज्यों के औषधि नियंत्रण विभाग निरीक्षकों, प्रयोगशालाओं तथा तकनीकी विशेषज्ञों की कमी से जूझ रहे हैं।

आगे की राह

  • गुणवत्ता आश्वासन को केवल अंतिम उत्पाद के परीक्षण तक सीमित न रखकर सम्पूर्ण विनिर्माण प्रक्रिया में एकीकृत किया जाना चाहिए।
  • उत्तरदायित्व बढ़ाने के लिए निरीक्षण निष्कर्षों एवं नियामकीय कार्यवाहियों का सार्वजनिक प्रकटीकरण किया जाना चाहिए।
  • नियामकीय निगरानी को अधिक प्रभावी बनाने हेतु आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), आँकड़ा विश्लेषण (Data Analytics) तथा डिजिटल ट्रैकिंग प्रणालियों का व्यापक उपयोग किया जाना चाहिए।

स्रोत: AIR

 

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